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हरियाणा के गाँव में शवों के साथ भेदभाव, शमशान घाट के बाहर दाह संस्कार को मज़बूर दलित समुदाय


 


चंडीगढ़,

23 फरवरी, 2021 


जातीय समीकरण और जातिगत भेदभाव की घटनाएं आज़ादी के सात दशक बाद भी देश में हमेशा चर्चा का विषय रही हैं. 

हालाँकि इस भेदभाव की रोकथाम के लिए समय-समय पर कानून व कानूनों में संशोधन अस्तित्व में आए, विभिन्न स्वयंसेवी संगठनों व बुद्धिजीवियों द्वारा इसके खिलाफ आवाज़ भी उठाई जाती है, परन्तु बावजूद इन सब के कहीं ना कहीं इस तरीके की घटनाएं, विशेषकर दलितों के साथ सार्वजानिक स्थानों पर भेदभाव आज तक जारी है.

ऐसा ही मामला पिछले दिनों प्रकाश में आया हरियाणा के भिवानी जिले के गाँव अलाउद्दीनपुर से जहाँ शमशान तक को पहले जातियों के आधार पर विभजित किया गया और अब दलितों के लिए निर्धारित शमशान भूमि को चारदीवारी से बाहर रख कथित भेदभाव की ताज़ा मिसाल कायम कर दी गई. 

यूँ तो लोहारू तहसील के इस गाँव में शमशान का जातिगत बँटवारा वर्षों से चला आ रहा था और सभी जातियों को अंतिम संस्कार के लिए अलग-अलग जगह निर्धारित की हुई थी पर मामला आक्रोश का विषय तब बना जब अनुसूचित जाति के कुछ लोगों ने कड़ा विरोध व ऐतराज जताया जब उनकी जाति विशेष को अंतिम ससंस्कार के लिए निर्धारित भूमि को शमशान की चारदीवारी से बाहर कर उन्हें जातिगत भेदभाव का ताजा निशाना बनाया गया.



ग्राम पंचायत के इस फैसले से आहत अनुसूचित जाति के ग्रामीणों ने सरपंच के खिलाफ कारवाई की मांग करते हुए प्रशासन के दरवाजा खटखटाया परन्तु नौ महीने से भी ज्यादा समय बीतने के बाद मामला अभी तक जांच के लिए विचाराधीन है.

जातिगत भेदभाव के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले ग्रामीण ओम प्रकाश ने बताया कि पिछले साल अनुसूचित जाति के हरी सिंह की मौत के बाद उसके शव का अंतिम संस्कार शमशान की चारदीवारी के बाहर करने पर मजबूर किया गया ये कहकर कि कथित समाज को दाह संस्कार के लिए जगह शमशान की सीमा-रेखा से बाहर निर्धारित है.



जिसके बाद इस पक्षपात से गुस्साए दलितों ने प्रशासन के पास गुहार लगाई और सरपंच के खिलाफ कारवाई की मांग की. जिला उपायुक्त को दी गई शिकायत के आधार पर लोहारू तहसीलदार व बीडीपीओ (खंड विकास तथा पंचायत अधिकारी) की अध्यक्षता में एक कमेठी को जाँच सौंप दी गई हालांकि सरपंच ने अपर्याप्त विकास धनराशि की दलील देकर अपना बचाव किया और कमेटी ने सरपंच को क्लीन चित दे दी परन्तु शिक़ायतकर्ताओं ने दोबारा जांच की अपील जिला प्रशासन को की और साथ ही अनुसूचित जातियां एंव पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग को भी कारवाई के लिए लिखा. 




जिसके उपरांत अनुसूचित जातियां एंव पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग द्वारा उपायुक्त, भिवानी को कथित मामले में सरपंच के खिलाफ अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत कारवाई कर रिपोर्ट करने के लिए लिखा गया है.




शिकायतकर्ता ओम प्रकाश का कहना है, "पहले तो वर्षों तक शमशान में जातिगत आधार पर बंटवारा कर गाँव के दलितों के साथ भेदभाव किया गया और अब तो भेदभाव की हद ही पार कर दी गई जब हम लोगों को शमशान की चारदीवारी से बाहर अंतिम संस्कार के लिए मजबूर किया जा रहा है. अपर्याप्त विकास धनराशि सिर्फ एक बहाना है, यह दबंगों की दलितों के खिलाफ सोची समझी साजिश है, दोषियों के खिलाफ कड़ी कारवाई होनी चाहिए। परन्तु बावजूद इसके के यह घटना दलितों के विरुद्ध सरेआम भेदभाव है और कानून का उलंघन है, अभी तक इस मामले में कोई कारवाई नहीं हुई है."

भिवानी डीसी ऑफिस को संपर्क करने पर पता चला कि एसडीएम लोहारू को दोबारा उक्त मामले की जांच करवाने के बारे खा गया है जबकि एसडीएम लोहारू जगदीश चंद्र ने बताया की बीडीपीओ को दोबारा मामले की जांच कर रिपोर्ट करने का आदेश दिया गया है और रिपोर्ट अभी आनी बाकि है. 

इस विषय में जब सरपंच सुरेश से सम्पर्क किया गया तो उन्होंने कहा, "मुझे उस समय इतनी समझ नहीं थी और न ही ये अंदाजा था की मामला इतनी गंभीर हो जाएगा। हालांकि मैं इस विषय में पहले ही आहत ग्रामीणों से माफ़ी मांग चुका हूँ." 

पंजाब एंव हरियाणा उच्च न्यायालय में एडवोकेट पारस बहल का कहना है कि कथित घटना संविधान के अनुच्छेद 14 व 15 (2) का उलंघन है जिनके तहत सार्वजनिक स्थान पर धर्म,जाति व लिंग आदि के आधार पर भेदभाव निषेध है.

बहल ने कहा, "मुझे आश्चर्य है कि आज भी समाज में ऐसी मानसिकता को बढ़ावा दिया जा रहा है जिसके तहत जातिगत भेदभाव के आधार पर अंतिम संस्कार के लिए अलग-अलग जगह निर्धारित की जाती हैं. दलितों के साथ यह भेदभाव संविधान में निहित मौलिक अधिकारों का घोर उल्लंघन है. दोषियों के विरुद्ध सख्त कानूनन कारवाई होनी चाहिए।"


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