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सलाम..., अलविदा.., 'जेंटलमैन कैडेट' अमूल रावल.....



चंडीगढ़,
18 मई, 2019

"मैं फूल खिला था गज़ब का, न खिलने में थी कोई कमी,
कम्बख्त काँटे रस्ता काट गए, पास आई मंज़िल गुम गई,
प्रयासों को लगा कुसमय का ग्रहण, उड़ानों से छूटा आसमां,
अभी कुछ ही पन्ने लिखे थे के मेरी कहानी अधूरी रह गई,
न ज़ज़्बातों में थी कमी उबलते लहू की, न हौंसलों का अभाव था,
दुर्भाग्यवश लेकिन एक स्वपन अधूरा रह गया, एक जवानी अधूरी रह गई...... "

हाल ही में देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी (Indian Military Academy - IMA) में नाइट नेविगेशन एक्सरसाइज के दौरान खाई में गिरने से जीवन क्षति का शिकार होने वाले जेंटलमैन कैडेट (Gentleman Cadet) अमूल रावल को सही मायनों में समर्पित होती है ये पंक्तियाँ।





साढ़े बीस साल की उम्र में आईएमए में प्रशिक्षण ले रहा अमूल लगभग 21 वर्ष की आयु में लेफ्टिनेंट बनकर इस साल के अंत में सेना में एक नौजवान अफसर बन जाना था। माँ-बाप, परिजन, रिश्तेदार, दोस्त और गाँव वाले सभी उस पल का इंतज़ार कर रहे थे कि अचानक 6 मई को अमूल के साथ घटी आकस्मिक, अप्रिय और अप्रत्याशित घटना ने सभी के स्वप्नों को रौंद डाला।

अमूल रावल की कहानी असाधारण है और कम उम्र में बुलंदियों की ऊंची उड़ान का उदाहरण भी।

हरियाणा के करनाल जिले के बड़े से गाँव कोहण्ड से पहली बार कोई सेना में ऊंचे पद पर अफसर बनना था, इतना ही नहीं, जिले में भी इस अल्पायु के दौरान इस कदर सफलता पे पथ पर अग्रसर, शायद बहुत ही कम मिशालें थी।




चंडीगढ़ के बहुचर्चित सेंट जॉन स्कूल में पढाई के दौरान राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कालेज (आरआईएमसी), देहरादून में प्रवेश हेतु परीक्षा पास कर अमूल ने अपनी काबिलियत को साबित कर दिया था। गौरतलब है कि आरआईएमसी में प्रवेश परीक्षा के लिए एक राज्य या एक केंद्र शासित प्रदेश में से एक ही छात्र का चुनाव होता है।

फिर 2015 में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (National Defence Academy - NDA) में प्रवेश कर तीन साल का सफल प्रशिक्षण और जनवरी 2019 में आईएमए में प्रवेश।

अनुशासन, सरलता, सहजता, सफलता और स्पष्टता अमूल के  व्यक्तित्व में भरपूर निहित थी।

कहते हैं सही मायनों में सफल व्यक्ति अपनी मिट्टी से हमेशा जुड़ा रहता है। छुटियों के दौरान गाँव आना परिजनों व अड़ोस-पड़ोस में सभी से शिष्टाचार से मिलकर जाना यह सब अमूल की भी खासियतें थी।

सेना में अफसर का प्रशिक्षण ले रहे अमूल की अन्य नौजवानों की तरह बहुत ज्यादा अपेक्षाएं नहीं रहती थी और इस बात का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि गत दिनों सरकार की तरफ से मिली एक लाख रूपये की राशि में से अमूल ने आधी राशि आरआईएमसी को दे दी जबकी बाकि आधी अपने छोटे भाई को।

पिता जय चंद रावल बताते हैं कि अमूल इतने साधारण स्वभाव का धनी था कि सेना में ट्रेनिंग के दौरान मिलने वाली राशि में से भी कुछ भी खर्च करके नहीं गया।

न सिर्फ परिजन, पूरा कोहण्ड गांव, यहाँ तक कि पूरे प्रदेश ने अमूल की दुखद और अल्पायु में क्षति पर विलाप किया।

अमूल रावल की याद में कोहण्ड में बन रहे स्टेडियम का नाम अमूल के नाम पर रखने का फैसला लिया गया है और साथ ही अमूल की मूर्ति भी वहां स्थापित की जाएगी ताकि आनेवाली पीढ़ी को अमूल रावल के आदर्श जीवन से प्रेरणा मिलती रहे।



अमूल रावल की क्षति केवल माँ-बाप और परिजनों के लिए एक बेटे की क्षति नहीं है अपितु कोहण्ड गांव व सम्पूर्ण हरियाणा ने एक होनहार बेटा खो दिया है, गुर्जर समाज ने एक उभरता सितारा गंवाया है और देश व सेना के लिए यह एक भावी अफसर की क्षति है।



सलाम..., अलविदा.., 'जेंटलमैन कैडेट' अमूल रावल.....

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