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कछुए की चाल चल रहा देश का "स्मार्ट सिटी मिशन"



चंडीगढ़, 
27 मार्च, 2019 

नरेंद्र मोदी सरकार की बहुचर्चित "100 स्मार्ट सिटी मिशन" परियोजना 'दूर का ख्वाब' साबित होती प्रतीत हो रही है।

एक आरटीआई जानकारी के मुताबिक दो लाख करोड़ रूपये के "100 स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट को मौजूदा सरकार ने चार वर्षों में मात्र सात फीसदी धनराशि दी है।

पानीपत के आरटीआई एक्टिविस्ट पीपी कपूर ने खुलासा किया है कि कुल 2,03,172 करोड़ रूपये के इस प्रोजेक्ट को चार वर्षों में मात्र सात फीसदी यानि 14,882 करोड़ रूपये ही केन्द्र सरकार दे पाई और इसमें से भी मौके पर इस धनराशि का नाममात्र ही उपयोग हुआ।

इस प्रोजेक्ट के अंतिम दो वर्षों में केन्द्र सरकार द्वारा दी जाने वाली धनराशि निरन्तर घटती गई। वर्ष 2015-16 में 1467.20 करोड़ रूपये, वर्ष 2016-17 में 4992.50 करोड़, वर्ष 2017-18 में 4552.50 करोड़ रूपये तो चौथे वर्ष 2018-19 में 3334 करोड़ रूपये सहित कुल 14,882 करोड़ रूपये केन्द्र सरकार ने दिए।

कपूर का दावा है कि आरटीआई इनफार्मेशन के अनुसार प्रधानमंत्री के खुद के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में कुल 2267.62 करोड़ रूपये के स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट को केन्द्र सरकार से पिछले चार वर्षों में मात्र 8.63 प्रतिशत यानि 196 करोड़ रूपये की धनराशि ही मिल पाई।

हरियाणा और पंजाब की राजधानी व केन्द्र शासित चण्डीगढ़ को कुल 6800 करोड़ रूपये में से मात्र 4.35 प्रतिशत यानि मात्र 296 करोड़ रूपये ही केन्द्र व यूटी सरकार से मिल पाए जबकि स्मार्ट सिटी दिल्ली को कुल 2998.27 करोड़ रूपये में से मात्र 6.53 प्रतिशत राशि यानि 196 करोड़ रूपये ही मोदी सरकार ने चार वर्षों में दिए।

हरियाणा में स्मार्ट सिटी फरीदाबाद को कुल प्रोजेक्ट राशि 2458.58 करोड़ रूपये में से कुल 390 करोड़ रूपये प्राप्त हुए। जिसमें से 196 करोड़ रूपये भारत सरकार ने व 194 करोड़ रूपये राज्य सरकार ने दिए। इनमें से मात्र 28.59 करोड़ रूपये प्रोजेक्टस पर खर्च किए गए जबकि 4.64 करोड़ रूपये प्रशासनिक व अन्य खर्चों की राशि है।

जबकि स्मार्ट सिटी करनाल को कुल 1211 करोड़ रूपये की प्रोजेक्ट राशि में से 50 करोड़ रूपये केन्द्र व 53 करोड़ रूपये राज्य सरकार दे पाई। इसमें प्रशासनिक व अन्य खर्चों पर 1.45 करोड़ रूपये किए गए। अभी तक करनाल में 12.52 करोड़ रूपये के चार प्रोजेक्ट अन्य विभागों के तालमेल से पूरे किए गए, 20.15 करोड़ रूपये के प्रोजेक्ट अन्य विभागों के तालमेल से चल रहे हैं। जबकि 125.60 करोड़ रूपये के कार्यों की निविदाएं आमंत्रित की गई हैं। 349.63 करोड़ रूपये की परियोजनाओं की विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाई जा रही है।

कपूर के मुताबिक पश्चिमी बंगाल के तीन शहरों विधान नगर, दुर्गापुर व हल्दिया को पिछले तीन वर्षोँ में एक रूपया भी केन्द्र सरकार ने नहीं दिया। इन तीन शहरों को वर्ष 2015 में मात्र 2-2 करोड़ रूपये दिए गए थे।

बिहार के चार शहरों को मात्र 411 करोड़ रूपये मिले। पटना (बिहार) को 2497.80 करोड़ रूपये के प्रोजेक्ट के लिए मात्र 104 करोड़ रूपये मिलेे। थाने (महाराष्ट्र) को 5404 करोड़ रूपये के प्रोजेक्ट के लिए मात्र 196 करोड़ रूपये मिले। सूरत (गुजरात) व विशाखापट्टनम (आन्ध्रा प्रदेश) को 291-291 करोड़ रूपये मिले। अमृतसर व जालन्धर को 56-56 करोड़ तो लुधियाना को 196 करोड़ रूपये मिले, मध्यप्रदेश के सात शहरों को 1319 करोड़ रूपये, महाराष्ट्र के 10 शहरों को 1572 करोड़ रूपये, राजस्थान के 6 शहरों को 1031 करोड़ रूपये, गुजरात के 6 शहरों को 962 करोड़ रूपये, आन्ध्रा प्रदेश के चार शहरों को 877 करोड़ रूपये की धनराशि प्राप्त हुई।

श्रीनगर को कुल 3816 करोड़ रूपये के प्रोजेक्ट में से मात्र 52 करोड़ रूपये मिले तो जम्मू को कुल 3459 करोड़ रूपये के प्रोजेक्ट में से मात्र 54 करोड़ केन्द्र सरकार ने दिए। बैंगलूरू (कर्नाटका) को 1792 करोड़ रूपये के प्रोजेक्ट में से मात्र 53 करोड़ रूपये ही मिले। आईजोल (मिजोरम) को 2052 करोड़ रूपये के प्रोजेक्ट में से मात्र 55 करोड़ रूपये मिले। इम्फाल (मणिपुर) को 1344 करोड़ रूपये के प्रोजेक्ट में से मात्र 111 करोड़ रूपये ही मिले। देहरादून (उत्तराखंड) को 1407 करोड़ रूपये के प्रोजेक्ट में से मात्र 56 करोड़ रूपये ही मिले। इसी प्रकार अरूणाचल प्रदेश के पासी घाट को 1484 करोड़ रूपये में से मात्र 54 करोड़ व ईटानगर को 1343 करोड़ रूपये के प्रोजेक्ट में से मात्र 52 करोड़ रूपये ही केन्द्र सरकार ने दिए।

शिलांग(मेघालय), डिंडिगुल(तमिलनाडू), अमरावती व ग्रेटर मुम्बई (महाराष्ट्र), गाजियाबाद, मेरठ/रायबरेली, रामपुर (यूपी), पश्चिमी बंगाल के दुर्गापुर, हल्दिया व विधाननगर को मात्र 2-2 करोड़ रूपये चार वर्षों में दिए गए।

कपूर का कहना है कि,"प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा जून 2015 में पूरे देश मेें 100 स्मार्ट सिटी के मिशन की घोषणा करने के बाद सरकार ये जानना भी भूल गई कि जमीनी स्तर पर कोई काम चल भी रहा है या नहीं। स्मार्ट सिटी के निर्माण में विकास कार्यों की यही कछुआ गति रही तो अगले 50 वर्षों तक एक भी स्मार्ट सिटी नहीं बन पाएगा। एक ओर जहां केन्द्र सरकार ने सौ स्मार्ट सिटीज का चयन किया है वहीं दूसरी और जिन शहरों को सहायता दी गई है उनकी संख्या आरटीआई के जवाब में 110 बताई है।"



उन्होंने कहा, "देशभर में कुल 100 स्मार्ट सिटी बनाने का पीएम मोदी का बहुचर्चित स्मार्ट सिटी मिशन दम तोड़ता नजर आ रहा है, सच्चाई से ज्यादा जुमला दिख रहा है।"

कपूर ने बताया कि उन्होंने देशभर के स्मार्ट सिटीज के निर्माण बारे 29 नवम्बर 2018 व 4 जनवरी 2019 को आरटीआई लगाई थी। इस पर भारत सरकार के आवास एवं शहरी विकास मंत्रालय (स्मार्ट सिटीज-1 प्रभाग)के केन्द्रीय जनसूचना अधिकारी संजय शर्मा ने 18 दिसम्बर 2018 व जनवरी 2019 में सूचना दी है।

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के लिए ब्रिटेन की दो कम्पनियों डीएफआईडी व टीएएससी के साथ भारत सरकार ने वर्ष 2016 व वर्ष 2017 में व फ्रांस की कम्पनी एएफडी से भी समझौते किए हैं। अमेरिकी कम्पनी ब्लूमवर्ग फिलेनथ्रपिस भी इस परियोजना में भारत सरकार के साथ सहयोगी है।

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के प्रमुख उद्देश्य हैं प्रचुर जलापूर्ति, निर्बाध बिजली सप्लाई, स्वच्छता, ठोस कचरा प्रबंधन, सुचारू पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम, विशेषत: निर्धन वर्ग के लिए सस्ते मकानों का निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य, नागरिकों विशेषत: महिलाओं, बच्चों व बुजुर्गों की सुरक्षा, स्वच्छ प्रशासन, ई-गवर्नैंस, पर्यावरण सुरक्षा आदि।

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